मनुष्यों की तीन श्रेणियां
(स्वामी आत्मानंद जी की रेडियो वार्ता)
एक प्रश्न मुझसे बारम्बार पूछा जाता है कि क्या नरक - स्वर्ग की धारणा पूरी तरह काल्पनिक नहीं है ? और यदि है तो क्या नरक और पाप का डर दिखाकर मनुष्य को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना उचित है ? उत्तर में वक्तव्य यह है कि विचारों की भिन्नता के कारण, बुद्धि की धारणा शक्ति की अधिकता या न्यूनता के कारण, मनुष्यों की अलग-अलग श्रेणियां होती हैं । कुछ लोग मानसिक विकास की दृष्टि से बालक के समान होते हैं, तो कुछ लोग प्रौढ़। प्रत्येक श्रेणी के व्यक्ति के लिए उसके अनुरूप व्यवस्था करनी होती है । मोटे तौर पर हम मनुष्यों को तीन श्रेणियों में बांट सकते हैं । एक तो वह हैं जो इस संसार को छोड़कर और कुछ नहीं जानते । यह दृश्यमान जगत ही उनके लिए सब कुछ है। यह लोग भौतिकवादी और इंद्रियपरायण होते हैं । खाना, पीना और मौज उड़ाना ही उनका लक्ष्य होता है। Enjoyment, Excitement and Exhaustion - यानी भोग, उत्तेजना और अवसाद के चक्र में पढ़कर ये लोग उचित और अनुचित का विवेक खो बैठते हैं और उत्श्रृंखल तथा पशुवत हो जाते हैं । ऐसे लोगों में पाप -पुण्य का कोई बोध नहीं होता। अपनी इंद्रियों की तुष्टि के लिए यह कुछ भी कर सकते हैं । ऐसे विवेकहीन मानव -पशुओं से समाज की रक्षा करने के लिए डंडे का उपयोग लाभप्रद सिद्ध होता है। इससे, कुछ ऊपर की श्रेणी वह है, जहां मनुष्य केवल देह के स्तर पर नहीं जीता, बल्कि एक वैचारिक आदर्श में आस्था रखता है। उसे यह विश्व आकस्मिकता या दुर्घटना से उत्पन्न एक लक्ष्यहीन भटकाव नहीं मालूम पड़ता, बल्कि वह इस संसार में एक अदृश्य नियामक शक्ति को अनुस्यूत देखता है, जिसे वह ईश्वर के नाम से पुकारता है। यह व्यक्ति विश्वास करता है कि अशुभ ग्रहों का फल अशुभ होता है और शुभ क्रियाओं का फल शुभ। इसलिए वह स्वर्ग और नरक पर विश्वास करता है और मानता है कि पुण्य के फल से स्वर्ग की प्राप्ति होती है तथा पाप के फल से नरक की। स्वर्ग वह है जहां सुख की सूक्ष्म कल्पना होती हो और नर्क वह है जहां दुख की वीभत्स से वीभत्स कल्पना मूर्त रूप धारण करती हो। मनुष्यों की यह दूसरी श्रेणी पाप और नरक के डर से कुमार्ग पर कदम डालने में हिचकती है । इन लोगों के लिए ईश्वर एक न्याय राजा के समान है, जो सत्कर्मों के लिए पुरस्कार और दुष्कर्मों के लिए दण्ड प्रदान करता है। मानव समाज के बहत्तर अंश के लिए पाप -पुण्य की यह कल्पना लाभदायक सिद्ध होती है। इससे भी ऊपर की श्रेणी वह है, जहां मनुष्य पाप-पुण्य की भावना से प्रेरित होकर क्रियाएं नहीं करता, जो ईश्वर को एक न्यायी राजा के समान नहीं देखता, बल्कि उसे सर्वान्तर्यामी सत्य के रूप में स्वीकार करता है और ऐसा मानता है कि यह सारा विश्व-ब्रह्मांड अटल और परिवर्तनशील नियमों द्वारा धारित है । यह नियम ही 'ऋत' और 'सत्य' के नाम से पुकारे गए हैं। इस तीसरी श्रेणी में अत्यंत विरले लोग होते हैं। इनके जीवन का लक्ष्य सुख की प्राप्ति ना होकर सत्य का शोधन होता है । ऐसे ही व्यक्ति सत्य दृष्टा बनकर 'ऋषि' के नाम से पूजित होते हैं। सारी मानव जाति को 'ऋषि' की उच्चतम स्थिति तक पहुंचा देना ही विकास की प्रक्रिया का लक्ष्य है। पर इस गंतव्य पर पहुंचने के लिए हमें प्रथम दो श्रेणियों में से गुजरना होता है । एक छोटा बच्चा जब चलना शुरू करता है, तो तीन पैर की गाड़ी का सहारा लेता है । जब वह चलना सीख जाता है, तो फिर उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं होती। पर इसका मतलब यह नहीं कि तीन पैर की गाड़ी निरर्थक हो गई । उसकी भी उपयोगिता है। दिशाएं कल्पित हैं, अक्षांश और देशांतर की कोई ऐसी रेखाएं नहीं है; जो दुनिया में कहीं खींची हो। वह पूरी तरह से काल्पनिक हैं। पर इन काल्पनिक दिशाओं से हमें ठोस लाभ मिलता है । हम उनके सहारे हवा में उड़कर या पानी में तैरकर अपने गंतव्य को पहुंच जाते हैं । हम ऊंट पर रेगिस्थान को पार कर सही स्थान को पा लेते हैं । यह कल्पना की व्यवहारिक उपयोगिता है। ठीक इसी प्रकार भले ही नर्क और स्वर्ग की धारणा काल्पनिक हो, पर उससे व्यवहारिक जीवन में ठोस लाभ मिलता है। एक श्रेणी के मनुष्यों को मर्यादा में बांधकर रखने के लिए जैसे पुलिस के डंडे की जरूरत है, वैसे ही दूसरी श्रेणी के लोगों को नैतिक मर्यादा में बनाए रखने के लिए पाप या नर्क के डर का प्रयोजन है । यह पाप का डर, पुलिस के भय की अपेक्षा अधिक कारगर सिद्ध होता है। इस पाप के भय का शिथिल हो जाना ही, हमारी समस्याओं के उलझाव का प्रमुख कारण है।