आत्मोन्नति के सोपान -6

 पाप और पुण्य       

(स्वामी आत्मानंद जी की रेडियो वार्ता)

 

प्राय: सभी धर्म और दर्शन पाप और पुण्य की विवेचना किया करते हैं; पर यह विवेचन, इतना जटिल होता है कि इससे पाप और पुण्य का  स्वरूप स्पष्ट होने के स्थान पर और उलझ जाया करता है।  एक ग्रंथ में पाप और पुण्य की बड़ी सरल परिभाषा दी गई है। वहां कहा गया है - " परोपकार: पुण्याय, पापाय परपीड़नम्" अर्थात् परोपकार पुण्य है तथा परपीड़न पाप ।  पर कुछ अतिवादी लोग परपीड़न का ऐसा मतलब लगाते हैं कि कभी किसी को दुख ही नहीं देना ।  इससे कई लोग शंका करते हैं कि चोर, डाकू, हत्यारा, लंपट, व्यभिचारी आदि दुराचारी व्यक्तियों से फिर किस प्रकार व्यवहार किया जाए? उन को दंड देना क्या परपीड़न नहीं है?  इसका उत्तर यह है कि अन्याय का प्रतिकार और अन्याय का दमन होना ही चाहिए और यह परपीड़न में ना आकर परोपकार में आता है।   कर्मों के तीन प्रकार माने जाते हैं।  पहला  - सामान्य कर्तव्य या सामान्य कर्म,  दूसरा - पुण्य कर्म और तीसरा - पाप कर्म। व्यक्ति सर्वदा समाज से संबंधित होता है। उसके विचारों और कर्मों का प्रभाव समाज पर भी पड़ता है। जब वह अपने और अपने परिवार के सदस्यों के निर्वाह के लिए उचित तरीकों का सहारा लेते हुए अपनी जीवन यात्रा तय करता है,  तो उसके यह कर्म सामान्य कर्तव्य के अंतर्गत आते हैं। यदि वह अनुचित तरीकों का सहारा लेता है, तो वह पाप कर्म करता है, और समाज को भी अधोगति की ओर ले जाता है। जो कर्म व्यक्ति और समाज की अवनति करते हैं, वह पाप कर्म की कोटि में आते हैं। दूसरी ओर जिन कर्मों से व्यक्ति और समाज की उन्नति होती है, उन्हें पुण्य कर्म कहते हैं। भर्तृहरि ने इन तीन प्रकार के व्यक्तियों का चित्रण अति सुंदर रूप से किया है। वह नीति शतक में कहते हैं - "एके सत्पुरुषा:  परार्थघटका स्वार्थान् परित्यज्य ये ।  सामान्यास्तु  परार्थमुदद्यमभृत: स्वार्थाऽविरोधन ये ।।  तेऽमी मानवराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये ।   ये तु घ्नन्ति  निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे .भर्तृहरि पुण्य कर्मी को सत्पुरुष कहते हैं। सामान्य कर्मी को सामान्य और पाप कर्मी को मानव राक्षस।  पापकर्मी की वे एक और कोटि भी बताते हैं, जो मानव राक्षस से भी गई बीती है । उसका नामकरण भी नहीं कर पाते । वे कहते हैं - "एक तो सत्पुरुष होते हैं जो अपना स्वार्थ तज कर दूसरों के हित साधन में लगे रहते हैं। दूसरी कोटि सामान्य पुरुषों की है, जो वहीं तक दूसरों की भलाई करते हैं, जहां तक उनके स्वार्थ में धक्का नहीं लगता। तीसरी कोटि में मानव राक्षस आते हैं, जो अपना मतलब साधने के लिए दूसरों का गला घोटने में भी नहीं हिचकते , पर वे लोग जो अकारण ही दूसरों के हित पर कुठाराघात किया करते हैं, किस कोटि में रखे जाएं, मैं नहीं जानता।" वस्तुतः दूसरों का कल्याण करना ही सर्वोच्च पुण्य है । गोस्वामी तुलसीदास ने तो परोपकार को सबसे बड़े धर्म के रूप में माना है । अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'मानस' में वे कहते हैं - " परहित सरिस धरमु नहिं भाई " अर्थात् परोपकार के समान महान अन्य कोई धर्म नहीं है ।  इसी प्रकार गोस्वामी जी परपीड़न से अधिक जघन्य पाप भी दूसरी नहीं देखते। वे कहते हैं - "परपीड़ा सम नहिं अधमाई ।" वस्तुत: पुण्य जहां समाज को संगठित और विकसित करता है, वहां पाप समाज में विघटन और विश्रृंखलता  की सृष्टि करता है। हमारे जो आचार एवं कार्य सामाजिक जीवन को सुदृढ़ बनाते हैं तथा विकसित करते हैं, जो शास्त्रानुकूल और मर्यादित हैं, वही पुण्य है तथा हमारे जिन कर्मों से समाज विघटित होता है , वे ही पाप कहे जाते हैं।