आत्मोन्नति के सोपान - 5

दुख की समस्या

(स्वामी आत्मानंद जी की रेडियो वार्ता)।                      

यह प्रत्यक्ष है कि हमारे समस्त दुखों का प्रारंभ मन में होता है ।मन हमारा मित्र है और शत्रु भी । वश में किया हुआ मन हमारा मित्र है, और जब यह मन हमें वश में कर लेता है, तब हमारा शत्रु है। यदि हम सावधानी से अपना विश्लेषण करें, तो देखेंगे कि मन ही हमारे सब दुखों का उद्गम स्थान है। भ्रमवश हम दूसरों पर दोष लगाते हैं। दूसरों पर दोष मढ़ना सहज है, पर अपने दुख के लिए जो स्वयं को दोषी मानता है, वह दुख से ऊपर उठने की दिशा में मानो एक कदम आगे बढ़ जाता है । यदि हम अपने मन पर ध्यान दें और देखें कि यह क्या है? तो हम देखते हैं कि यह सदा परिवर्तनशील है। एक क्षण में वह सुखी होता है और एक क्षण में दुखी। कभी अचानक ही वह चिड़चिड़ा हो जाता है । पर हममें से अनेक, मन के इस अकस्मात परिवर्तन का कारण पकड़ नहीं पाते। क्यों ? इसलिए कि हममें संयम नहीं है; इसलिए कि मन अत्यंत चंचल है। मन की यह  चंचलता ही उसकी विक्षिप्तता का कारण है। मन की चंचलता को मन पर निगाह डालने के अभ्यास द्वारा कम किया जा सकता है। हमें अपने विचारों को देखने का अभ्यास करना होगा। यदि हम नियमित रूप से कुछ समय तक ऐसा अभ्यास करें,  तो हम अपने मन का अध्ययन करने में तथा इसके परिवर्तन को देख सकने में समर्थ हो सकेंगे। प्रश्न उठता है कि मन के इस परिवर्तन को कौन देखता है । कोई वस्तु, जो हमारे भीतर ही है। हम यह अनुभव कर सकते हैं कि हम स्वयं ही अपने मन को देख रहे हैं । हम कहते हैं - 'मेरा मन मुझे दु:ख देता है।' यह कथन ही स्पष्ट करता है कि मैं मन से पृथक हूं । अंत: हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि हमारे भीतर मन से अतीत कोई वस्तु है और वह वस्तु है चेतना। यदि हम इस चेतना को पकड़कर मन से ऊपर उठ जाएं,  तो हम मन को नियंत्रण में लाने में समर्थ हो सकेंगे और इस प्रकार दुख की समस्या का समाधान कर लेंगे । आर्कमिडीज  ने कहा था यदि हम पृथ्वी से परे, पर्याप्त दूरी पर एक स्थान ढूंढ सकते, तो हम पृथ्वी को ढेंकली से उसी प्रकार उठा या झुका सकते थे जैसे कि एक सेब को । इसी तरह यदि हम मन से परे तथा मन से दूर एक स्थिति ढूंढ ले ढूंढ सकें, तो अपने मन को पूर्णतया संयत कर सकते हैं। पर मुश्किल यह है कि हम अपने मन और शरीर से तदाकार हो जाते हैं, इसीलिए मन को अपने नियंत्रण में नहीं ला पाते। फलस्वरूप हम दुख का अनुभव करते हैं। अच्छा, एक प्रश्न पूछें। दुखी कौन होता है? हमारा मन,  शरीर या दोनों ? जब हम शारीरिक व्यथा का अनुभव करते हैं,  तब व्यथा शरीर की होती है । दूसरी ओर जब हम अपमान या हानि सहते हैं, तब हम व्यथा का अनुभव शरीर में नहीं, मन में करते हैं। जब हम अन्य किसी व्यक्ति के व्यापार में घाटा पड़ जाने की बात पढ़ते हैं, तब हमें इतना दुख नहीं होता। किंतु यदि यह व्यापार हमारा हो, तो हमें कठोर आघात पहुंचता है। यह सब इस पर निर्भर करता है कि हम उस दुर्घटना से कितने संबंधित हैं। हम यह स्पष्ट देख सकते हैं कि जब हम मन को इन वस्तुओं के साथ एकाकार कर लेते हैं , तभी दुखी होते हैं। यदि हम अपने मन को दुख के विषय से एकाकार न करें, तो संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं,जो हमारे दु:ख का कारण बने । हमें चाहिए कि हम शरीर और मन से एकाकार ना हों। पर प्रश्न यह है कि यह संभव कैसे हो?  हमने पूर्व में मन से परे जिस चेतना की बात कही,  उसमें यदि हम अपनी आस्था गहरी कर सकें, तो धीरे-धीरे यह संभव है कि हम अपने मन पर नियंत्रण पा लें। पहले युक्तियों, तर्कों और प्रमाणों के बल पर हमें इस चेतना की बौद्धिक धारणा करनी पड़ती है, तत्पश्चात इस चेतना को अनुभव में लाने का प्रयास करना पड़ता है श्वेताश्वतर  उपनिषद कहता है -"यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवा:। तदा देवमविज्ञाय दु:खस्यान्तो  भविष्यति ।।" ---"जब मनुष्य आकाश को चमड़े के समान लपेट लेंगे,  तब देव यानी ईश्वर यानी उस विराट चेतना को बिना जाने दुख का अंत हो सकेगा।"   तात्पर्य यह मनुष्य आकाश को चमड़े के समान कभी  लपेट नहीं सकता । अंत: बिना उस विराट चेतना की अनुभूति के दुख का भी अंत नहीं हो सकता। दुख की समस्या का स्थायी समाधान केवल इसी प्रकार संभव है।