आत्मोन्नति के सोपान -3

"मोक्ष क्या है"

(स्वामी आत्मानंद जी की रेडियो वार्ता)।                                      

धर्म ग्रंथों में मोक्ष की बात कही गई है । मोक्ष को जीवन के  परम प्रयोजन के रूप में स्वीकार किया गया है । हिंदू धर्म में चार पुरुषार्थ माने गए हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । इस प्रकार मोक्ष को चार पुरुषार्थों में प्रमुख तथा अन्य तीन पुरुषार्थ द्वारा प्राप्तव्य लक्ष्य के रूप में माना गया है । वैसे मोक्ष का सरल अर्थ होता है मुक्ति। पर प्रश्न उठता है कि किससे मुक्ति? हमें किसने बांध रखा है जिससे हम मुक्ति चाहते हैं?  इसके उत्तर में कहा जाता है कि हमें हमारी इंद्रियों ने, हमारे मन ने बांध रखा है । हम इंद्रियों के गुलाम बन गए हैं । मन हमें जिधर चाहता है नचाता रहता है । देह और मन की गुलामी को ही बंधन माना गया है । इस बंधन का हटना ही मोक्ष कहलाता है |प्रश्न उठता है कि मनुष्य देह और मन का गुलाम क्यों हो गया है?  इसलिए कि वह अपने आत्मस्वरूपता को भूल गया है । उसने यह तथ्य विस्मृत कर दिया है कि वह आत्मा है । अपनी आत्मस्वरूपता को जगाने के लिए मनुष्य को विचार करना पड़ता है कि मैं देह नहीं हूं,  मन नहीं हूं । देह सतत परिवर्तित हो रही है । वह चेतन नहीं हो सकता,    वह मात्र जड़ है । चेतन वह है, जो इस परिवर्तन का अनुभव करता है । देह और मन सतत परिवर्तनशील होने के कारण जड़ हैं । मनुष्य के भीतर का जो चेतन तत्व, देह और मन के परिवर्तनों का अनुभव करता है उसी को आत्मा कहते हैं । मनुष्य जब एवंविध विवेक - विचार के द्वारा अपने को देह तथा मन से भिन्न आत्मतत्व के रूप में अनुभव करता है , उस अवस्था को मोक्ष कहते हैं । शास्त्रों में कहा गया है- " मन एव मनुष्याणां  कारणं बन्धमोक्षयो:" - अर्थात मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष दोनों का कारण है. संसार की आसक्ति में पड़ा हुआ मन बंधन का कारण है , पर संसार के भोगों से अनासक्त हुआ मन मोक्ष का कारण बन जाता है। प्रश्न उठता है कि मन को अनासक्त कैसे बनाएं ? हम पहले कह चुके हैं कि धर्म और मोक्ष के समान अर्थ और काम को भी पुरुषार्थ माना गया है । हमने अर्थ और काम को तिरस्कार की दृष्टि से नहीं देखा है , उनकी अवहेलना नहीं की है । उसकी शक्ति को,  महत्व को स्वीकार किया है। 'अर्थ' का तात्पर्य है सत्ता और 'काम' सृष्टि का बीज है । मनुष्य में अर्थ और काम की वृत्तियां रूढ़ है । ये मनुष्य को दलदल में भी फंसा सकती हैं तथा मुक्त गगन में भी उड़ा सकती हैं । जब मनुष्य केवल देह के धरातल पर ही अर्थ और काम का उपभोग करता है, तो मानो वह संसार- कीच में फंस जाता है,  पर जब धर्म के द्वारा उन दोनों का नियंत्रण करते हुए उन दोनों का उपभोग करता है , तो मोक्ष के उन्मुक्त गगन की ओर उड़ चलता है । अर्थ और काम का प्रवाह उद्धाम है  । यदि प्रवाह पर रोक न लगे, तो वह अनियंत्रित रूप से फैलकर, प्लावन का रूप धारण कर कितने ही गांव को डूबा कर नष्ट कर देता है।  पर जब उसी नदी पर बांध बांधा  जाता है, तो वहीं जल नियंत्रण में आकर लोगों के अशेष कल्याण का हेतु बन जाता है । इसी प्रकार यदि अर्थ और काम की विधियां अनियंत्रित हों, तो वह मनुष्य का नाश कर देती हैं, पर जब धर्म के द्वारा उन दोनों को अंकुश में रखा जाता है, तो वही मनुष्य को मोक्ष की ओर बहा ले चलती है । स्वामी विवेकानंद मोक्ष को नि:स्वार्थता के रूप में देखते हैं । उनकी दृष्टि में वही व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी है, जो पूरी तरह से नि:स्वार्थ है । व्यक्ति में तनिक सा भी स्वार्थ के रहते वह मोक्ष से दूर हैं वे नि:स्वार्थता को ही धर्म की कसौटी मानते हैं । जिसमें नि:स्वार्थता जितनी अधिक है,  वह उतनी ही मात्रा में धार्मिक है। और वह उतना ही अधिक मोक्ष के रास्ते पर जायेगा। मोक्ष का फल मनुष्य को इसी जीवन में अनुपम आनंद के रूप में प्राप्त होता है । देह, इंद्रिय और मन की दासता से मुक्त हो उन्हीं को अपना दास बना लेना और अपनी इच्छा के अनुसार उनका परिचालन करना यही मोक्ष का सर्वश्रेष्ठ फल है।