जीवन – संग्राम”
(स्वामी आत्मानन्द जी की रेडियो वार्ता)।
यह जीवन संग्राम बहुत विकट है। मनुष्य को तीन क्षेत्रों में यह संग्राम लड़ना पड़ता है । एक तो वह है, जहां मनुष्य प्रकृति से लड़ता है । दूसरा वह जहां मनुष्य मनुष्य से लड़ता है और तीसरा वह है जहां मनुष्य अपने आप से लड़ता है । इन तीनों युद्धों के रण कौशल अलग-अलग होते हैं पहली लड़ाई के लिए मनुष्य भौतिक विज्ञान से सहायता लेता है दूसरी के लिए वह समाज विज्ञान से और तीसरी के लिए वह मनोविज्ञान का सहारा लेता है । कभी उसे सफलता मिलती है, तो कभी विफलता । जब वह विफल होता है, तब इस संग्राम से विरत होने का विचार करता है । उसे लगता है कि दुनिया एक झमेला है और इसे छोड़कर मुझे कहीं जंगल में चले जाना चाहिए । बारम्बार संसार से पलायन की बात सोचता है। पर क्या जीवन संग्राम को छोड़कर भाग जाना उसकी समस्या का समाधान कर सकेगा ? मनुष्य भ्रम में पड़कर सोचने लगता है कि बाहरी परिस्थितियों में परिवर्तन से उसे शांति मिल सकेगी । वस्तुतः शांति तो उसके स्वयं के ही भीतर में है। जंगल में जाने मात्र से शांति नहीं मिल जाती । शांति पाने के लिए हमें बाहरी परिस्थितियों में नहीं, स्वयं अपने भीतर परिवर्तन करना पड़ेगा । मेरे पैर में कांटा गड़ जाने से यदि मैं यह सोचूं कि दुनिया का सारा कांटा मैं जलाकर भस्म कर दूंगा, तो यह मेरी नितांत नादानी ही होगी । उचित यह होगा कि मैं जूते पहन कर चलूं, जिससे कांटे का कष्ट मुझे न झेलना पड़े । वर्षा के कष्ट से दुखी होकर मैं यदि सोचूं कि वर्षा को ही बंद कर दूं, तो यह संभव नहीं है। उचित यह है कि मैं छाता खोल कर अपने को वर्षा के कष्ट से बचा लूं ।जीवन से जुड़ने के लिए हमें अपने मन में परिवर्तन लाना होगा, अपनी दृष्टि बदलनी होगी। हम पढ़ते हैं कि अर्जुन ने एक महाभारत लड़ा । हमारे भी भीतर एक महाभारत चल रहा है । अर्जुन का महाभारत तो अठारह दिन में समाप्त हो गया, पर हमारे भीतर का महाभारत जाने कब से अनवरत चलता चला हुआ है और रुकने का नाम नहीं लेता । हमारे भीतर भी दो सेनाएं हैं - एक है देवताओं की या नीतियों की सेना और दूसरी है असुरों की यानी अशुभ प्रवृत्तियों की सेना । देवासुर संग्राम प्रत्येक मनुष्य के अंतर में चला हुआ है । अच्छाई और बुराई की यह ठनाठनी प्रतिक्षण चल रही है ।हमारे भीतर आत्मा की आवाज उठती है, फिर शैतान भी अपने बोल सुनाता रहता है । आत्मा की आवाज हमें कुपथ में जाने से रोकती है, हमें सावधान करती है कि कहीं असुरों के फंदे में न पड़ जाना । वह हमारा सही - सही मार्गदर्शन करती है । पर शुभ की यह आवाज बहुधा क्षीण होती है । दूसरी ओर अशुभ मानो बुलंद आवाज में हमसे कहता है - "अरे,यह क्या अच्छाई -अच्छाई की रट लगा रखी है। संसार में कहीं अच्छाई है भी? छल - प्रपंच, कपट - द्वेष का ही नाम तो संसार है । अगर आगे बढ़ना है, तो दूसरों को छलो । अगर संसार में बचे रहना है, तो दूसरों को ठगो, सबसे धोखाधड़ी करो, येन - केन- प्रकारेण अपना उल्लू सीधा करो ।" और हम इन दो आवाजों के बीच भी भ्रमित हो खड़े हो जाते हैं । हमें कुछ सूझ नहीं पड़ता । बलात् हमारे पैर असुर सेना की ओर खींचने लगते हैं । तब मन के किसी कोने से एक धीमा सा स्वर सुनाई पड़ता है- "मैं तुम्हारा शुभाकांक्षी हूं । मैं तुम्हारे भीतर का शुभ हूं, देवता हूं, भले अभी शिथिल हूं, पर पूरी तरह से सोया नहीं हूं । जिस रास्ते तुम कदम बढ़ा रहे हो, उससे तुम्हारा अमंगल ही होगा ।" और तब मेरे पैर ठिठक जाते हैं । हृदय के भीतर मंथन होने लगता है । एक ओर संसार के सुनहरे सपने, तड़क-भड़क का प्रलोभन, आमोद प्रमोद का जीवन, इंद्रियों को उत्तेजित और तृप्त करने के साधन और दूसरी ओर जीवन के शाश्वत मूल्यों की झांकी, इंद्रियों और मन के स्वामी बनने का दृश्य, त्याग और संयम का जीवन, सेवा और दूसरों के काम आने का भाव । और इन दोनों के बीच हम मथित होने लगते हैं । यह मंथन ही हमारे पौरुष को जागृत करता है और हमें जीवन संग्राम का यथोचित रूप से सामना करने की शक्ति प्रदान करता है यदि हम अपने इस जाग्रत हुए पौरुष का सहयोग अपने भीतर की शुभ की सेना के साथ करते हैं तो भौतिक - विज्ञान समाज - विज्ञान और मनोविज्ञान की रचनात्मक और रक्षणात्मक शक्तियां हमारी सहायता के लिए सामने आती हैं । फलस्वरूप, हम निश्चय ही जीवन - संग्राम में विजयी होते हैं तथा शांति के अधिकारी बनते हैं।