आत्मोन्नति के सोपान -1 

 जीवन का प्रयोजन"                    

(स्वामी आत्मानंद जी की रेडियो वार्ता)                                      

जीवन के प्रयोजन पर दो दृष्टियों से विचार किया गया है। पहली दृष्टि जड़वादी दृष्टि है। विज्ञान इस दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है। तथा, दूसरी दृष्टि आध्यात्मिक दृष्टि है। भारत की तत्व मीमांसा और विशेषकर वेदांत में यह दृष्टि निबध्द है । जीवन के सूक्ष्मतर रहस्यों के क्षेत्र में विज्ञान की कोई गति नहीं है, इसलिए वह जीवन के प्रयोजन पर तात्विक दृष्टि से विचार नहीं कर सकता । जो लोग भौतिकवादी विचारधारा रखते हैं वे इस जन्म को तथा जीवन की समस्त घटनाओं को एक्सीडेंट (आकस्मिक) माना करते हैं। भारत में भी ऐसे जड़वादी चार्वाक रहे हैं, जिन्होंने जीवन के आगे पीछे कुछ भी नहीं देखा। वे तो यहां तक कह गए कि "यावज्जीवेत् सुखम जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् । भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुत: - जब तक जियो मौज से जिओ । यदि उसके लिए उधार लेकर घी पीने की आवश्यकता हो, तो वह भी करो । एक बार देह के भस्मभूत हो जाने पर आने का सवाल ही कहां है?  अनेक भौतिक वादियों ने इस जीवन को आकस्मिक माना।वे  इसका कोई लक्ष्य या उद्देश्य नहीं देख पाए । पर आज का विज्ञान किसी घटना को आकस्मिक नहीं कहता । यदि कोई 'आकस्मिक' बात दिखाई देती है तो केवल इसलिए कि हम उसके पीछे छिपे नियम को जानने में असमर्थ हैं । इसी प्रकार आज का विज्ञान भी जीवन को निरुदेश्य नहीं मानता । हम प्रवाह -पतित तिनके नहीं है कि जिधर हमें प्रवाह ले जाए, बहते रहेंगे । आज कोई भी व्यक्ति अपने जीवन को लक्ष्य हीन नहीं मान सकता । पैसा कमाना और धन संचय करना, परिवार का पालन पोषण करना, समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करना - यह सब जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकता।  यह तो पशु-पक्षी भी करते हैं।  चीटियां संग्रह करती हैं, पशु पक्षी अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं , पशु भी अपने दल का नेता होना पसंद करते हैं । यदि मनुष्य भी इसी सब कुछ को स्पृहणीय माने, तो उसमें और पशु में क्या भेद?  संस्कृत के एक  सुभाषित में कहा गया है-  "आहार निद्रा भय मैथुनश्च, सामान्यमेतत् पशचभिर्नराणाम् ।  धर्मो हि तेषामधिको विशेष:, तेनैव हीना: पशुभि: समाना।।" -  आहार, निद्रा, भय और प्रजनन की प्रवृत्तियां पशुओं और मनुष्यों में समान हैं। मनुष्यों में धर्म की वृत्ति अधिक या विशेष हुआ करती है । यदि मनुष्य धर्म की वृत्ति से हीन हो जाय तो वह पशु के ही समान है । वह धर्म ही मनुष्य में विशेषता लाता है । पशु अपने मन का नियंत्रण नहीं कर सकता  वह अपनी गतिविधियों का साक्षी नहीं बन सकता, क्योंकि वह अपनी सहज प्रवृत्तियों के द्वारा परिचालित होता है। पर मनुष्य का मन इतना विकसित है कि वह अपनी क्रियाओं को समझने और पकड़ने में समर्थ होता है, वह मानो सहज हटकर अपनी क्रियाओं को देख सकता है । यही उसकी विशेषता है पर यह विशेषता आज उसमें संभावना के रूप में छिपी है । यह संभावना कितनी मात्रा में प्रकट होती है उतनी मात्रा में मनुष्य अपनी विकास यात्रा का स्वामी होता जाता है और जिस दिन वह इस संभावना को पूरी तरह प्रकट कर लेता है , उस दिन वह पूर्ण बन जाता है,बुध्द बन जाता है, कृष्ण  और ईसा बन जाता है, रामकृष्ण बन जाता है । सत्य का साक्षात्कार कर लेता है । उसके जीवन में तब विकास - क्रम की पूर्णता साबित हो जाती है। लिंकन बार्नेट अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ' दि यूनिवर्स एंड डाक्टर  आइंस्टीन' में लिखते हैं कि मनुष्य अपनी इस संभावना से अपरिचित होने के कारण ही अशांति और दुख का शिकार है । उसके अनुसार मनुष्य की 'नोबलिस्ट एंड मोस्ट मिस्टीरियस फैकल्टी' -सबसे उदात्त और रहस्यमयी क्षमता है- " दि एबिलिटी टू ट्रांसलेट हिमसेल्फ एंड परसीव हिमसेल्फ इन द एक्ट ऑफ परसेप्शन"- अपने को लांघकर देखने की इस क्रिया में अपने आप को देखने की सामर्थ्य । मनुष्य की इसी क्षमता को हम धर्म की भाषा में साक्षी भाव के नाम से पुकारते हैं। मनुष्य में पशु में यह क्षमता नहीं होती। इस उपाय से मनुष्य अपनी इस क्षमता को अभिव्यक्त करता है, उसे हम धर्म के नाम से संबोधित करते हैं ।अपनी इस क्षमता का प्रकाशन मानव जीवन का चिर प्रयोजन है।