सुप्रभातम्
माँ की वाणी
एक बार नरेंद्र ने कहा, 'श्रीमाँ, आजकल मेरा सब उड़ा जा रहा है। देखता हूँ सब उड़ा जा रहा है।' श्रीमाँ ने थोड़ा हँसते हुए कहा, 'देखो, कहीं मुझे न उड़ा देना।' नरेंद्र बोला, 'माँ, तुम्हें उड़ा देने से मैं रहूँगा कहाँ? जो ज्ञान गुरु के पादपद्मों को उड़ा देता है, वह तो अज्ञान है। गुरु के पादपद्मों को उड़ा देने से ज्ञान ठहरेगा कहाँ?'
जाकी रही भावना जैसी
एक बार विनोबा जी बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल श्री आर. आर. दिवाकर से मिलने गये, साथ में अन्य लोग भी थे। अँधेरा हो चला था, अतः कुछ स्पष्ट दिखाई न दे रहा था। राजभवन के प्रांगण में एक मूर्ति देखकर उन्होंने पूछा, "यह किसकी मूर्ति है?" एक साथी ने अनजाने में कह दिया, "महात्मा गाँधी की।" विनोबा ने सुना, तो उन्होंने उस मूर्ति का अभिवादन किया और उसकी प्रदक्षिणा कर प्रसन्नता से आगे बढे।
लौटते समय उस व्यक्ति ने मूर्ति को गौर से देखा, तो उसे दिखाई दिया कि वह पंचम जार्ज की है। वह विनोबा जी से बोला, "क्षमा करें, मैंने अज्ञानवश इस मूर्ति को गाँधीजी की बताया था, वास्तव में यह तो पंचम जार्ज की है।" इस पर विनोबा जी बोले, "पहली बार जब मैंने इसे महात्मा गाँधी की मूर्ति समझकर प्रणाम किया था।, उस समय इसमें बापूजी की पवित्र आत्मा विद्यमान थी। मेरी गोचर दृष्टि तेज नहीं है, लेकिन भावना अवश्य ही विशाल है। आप तो जानते ही हैं कि 'जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी।"