अभ्यास ।
(स्वामी आत्मानंद जी की रेडियो वार्ता)।
जीवन के हर क्षेत्र में अभ्यास की बड़ी महिमा है। किसी भी क्रिया को इस प्रकार दुहराना कि वह सहज हो जाए, अभ्यास कहलाता है । अभ्यास की प्रारंभिक प्रक्रिया उबाऊ और कष्टदायक होती है। पर जब अभ्यास सध जाता है, तब वही प्रक्रिया हमारे लिए सहज होकर सुखकर हो जाती है। हम तैरने का अभ्यास करते हैं, पहले- पहल अंग अंग टूटने लगता है । देह थकावट से चूर हो जाती है। पर जब तैरने का अभ्यास सध जाता है, तब हम अपनी थकावट दूर तैरने जाते हैं। जाकर पानी पर चित लेट जाते हैं। हाथ पैर नहीं हिलते। पर इस क्रियाहीन दिखने वाली स्थिति को साधने के लिए हमें कितना अभ्यास करना पड़ता है- यह तो वही जानता है, जो इस प्रक्रिया से गुजरा है|हमें रविशंकर का सितार वादन कितना चमत्कृत करता है। पर उसके उस मुग्धकारी सितारवादन के पीछे अभ्यास निहित है। जब हम टाइप करना सीखते हैं, तो धीरे-धीरे अपनी उंगली देख -देख कर की बोर्ड पर रखते हैं। हमारा ध्यान तनिक इधर-उधर बंटा नहीं कि भूल हो जाती है। पर जब टाइपिंग का अभ्यास सब जाता है, तब हम दूसरों से बात करते हुए भी टाइपिंग कर लेते हैं । हमें की बोर्ड की ओर देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती । मानो हमारे मन का एक भाग अभ्यास के फलस्वरुप टाइपिंग की क्रिया से सदैव जुड़ा रहता है।जैसे भौतिक क्षेत्र में मनुष्य की सफलता अभ्यास पर निर्भर रहती है , वैसे ही आध्यात्मिक क्षेत्र में भी सफलता का रहस्य अभ्यास ही है। हमारा मन बड़ा चंचल है। उसकी चंचलता को समझाने के लिए स्वामी विवेकानन्द एक बंदर की उपमा देते हैं। बंदर स्वभाव से चंचल होता है। कल्पना करें इसे शराब पिला दी गई है। वह कितना चंचल न हो जाएगा। अब और मान लें कि उस मस्त बंदर को बिच्छू ने डंक मार दिया है। फलस्वरूप बंदर की जितनी चंचलता की कल्पना करेंगे, हमारा मन वैसा ही चंचल है। प्रश्न उठता है कि क्या ऐसे चंचल मन को अपने काबू में किया जा सकता है। इस पर प्रतिप्रश्न किया जा सकता है कि मन को काबू में लाने की क्या जरूरत? इसका उत्तर यह है कि चंचल मन वाला व्यक्ति ना दुनिया में सुख से रह सकता है और ना अध्यात्म के क्षेत्र में ही प्रगति कर सकता है। चंचल मन वाले विद्यार्थी परीक्षा में संतोषजनक रूप से उत्तीर्ण नहीं हो पाते। चंचल मन वाला व्यवसाई अपने व्यवसाय में मन नहीं लगा पाता। इसलिए उसे अभीष्ट सफलता भी नहीं मिल पाती । चंचल मन के द्वारा जब यह लोक ही नहीं सधता, तब उस लोक की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती।अतः चंचल मन को निग्रह में लाना सभी दृष्टि से आवश्यक है । पर प्रश्न यह है कि क्या ऐसा चंचल मन काबू में लाया जा सकता है? यही प्रश्न अर्जुन ने श्री कृष्ण से किया था । पूछा था - "चंचलम् हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढ़म्। तस्याहं निग्रहम् मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।" ---कृष्ण, मन तो अत्यंत चंचल है, उसका स्वभाव ही मथने का है, वह बड़ा बली और जिद्दी है। उसको काबू में लाना मैं वैसा ही कठिन मानता हूं, जैसे वायु को वश में करना ।इसके उत्तर में कृष्ण, अर्जुन की बात नहीं काटते, उसका समर्थन करते हैं। पर साथ ही यह भी स्वीकार नहीं करते कि मन को वश में नहीं लाया जा सकता। वे कहते हैं -"असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहम्। अभ्यासेन कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ।। "-हे महाबाहो, निसंदेह मन अत्यंत चंचल और दुर्जय है , पर हे कुंती पुत्र, ऐसे मन को भी अभ्यास और वैराग्य के द्वारा काबू में लाया जा सकता है|यहां पर भगवान कृष्ण ने अभ्यास शब्द का उपयोग किया है ।अभ्यास के द्वारा दुर्जय मन को भी वश में किया जा सकता है। जो बात पहले सागर को पार करने के समान दुष्कर मालूम पड़ती है, अभ्यास के द्वारा वही गोष्पद को लांघने के समान सहज हो जाती है।बचपन में एक कहानी पढ़ी थी। एक ग्वाला रोज गाय के बछड़े को हाथों में लेकर उठा लेता। बछड़ा बढ़ता गया, पर ग्वाला रोज ही उसे उठा लेता। एक दिन वह बछड़ा भारी-भरकम सांड बन गया। पर वाला उसे भी उठा कर सब को चमत्कृत कर देता। उसका राज यह था कि वह उसे उसके बचपन से ही रोज उठाता आ रहा था ।यही अभ्यास का चमत्कार है। कहा भी तो है - 'रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निशान' - बाल्टी की रस्सी रोज कुएं के पत्थर पर चल- चल कर उसे काट देती है। यह अभ्यास की क्षमता है।