आत्मोन्नति के सोपान -12            

 अपरिग्रह               

(स्वामी आत्मानंद जी की रेडियो वार्ता)    ।आध्यात्म के साधकों को के लिए 'अपरिग्रह' महाव्रत के रूप में रखा गया है। महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्रों में उसे अष्टांग - योग साधन के अंतर्गत यम के पांच स्तंभों में से एक माना है। 'अपरिग्रह ' का अर्थ होता है 'परिग्रह' का अभाव। और परिग्रह का तात्पर्य है - लेना, स्वीकार करना। इस प्रकार अपरिग्रह वह गुण है जो किसी से भेंट स्वीकार करने का निषेध करता है। यह तो एक जानी मानी जानी समझी बात है कि जब हम किसी से कोई भेद ग्रहण करते हैं, तो हमारा मन देने वाले के प्रति कृतज्ञता का अनुभव करता है। और स्वाभाविक ही उससे प्रभावित भी होता है । ऐसा प्रभाव हमारे आध्यात्मिक जीवन के लिए हानिकारक हो सकता है। इसलिए परिग्रह का निषेध किया गया है। आध्यात्मिक जीवन की बात छोड़ भी दें, तब भी सामान्य जीवन में भी परिग्रह स्वास्थ्य कर नहीं होता। स्नेह और निस्वार्थ भेंट संसार में एक विरल बात है। हम अपने अत्यंत नजदीकी लोगों को प्यार-स्वरूप कोई भेंट देते हों, तो उसमें कोई आपत्ति नहीं है। आपत्ति तब होती है जब व्यक्ति हमसे कुछ अनुचित कराने के लिए हमें उपहार देता है। ऐसे व्यक्ति से कुछ स्वीकार करना आपद ही मोल लेना होता है। दशहरा दिवाली में वह हमें कुछ भेंट करना चाहेगा और यदि हम स्वीकार नहीं करेंगे, तो कहेगा कि यह तो बच्चों के लिए लेता आया हूं । अगर हमने भेंट स्वीकार कर ली, तो समझ लीजिए हमें परिग्रह के दोष घेर लेंगे और हमारा मन उस भेंट देने वाले व्यक्ति के द्वारा प्रभावित हो जाएगा। फलत: हम नैतिकता के मानदन्ड को सुरक्षित नहीं रख पाएंगे।                                   मेरे एक परिचित जिला एवं सत्र न्यायाधीश थे। बड़े ईमानदार और न्याय परायण। वे एक किस्सा सुनाते हैं, एक व्यक्ति उनसे परिचित होने के लिए आतुर था। उसने अपनी पत्नी को उस क्लब का सदस्य बना दिया, जहां न्यायाधीश महोदय की पत्नी जाया करती थी। उस व्यक्ति की पत्नी ने न्यायाधीश की पत्नी से मेलजोल बढ़ाया। धीरे-धीरे तोहफों और भेंटो का एकतरफा दौर शुरू हुआ। दोनों परिवार घनिष्ठ होते गए, एक दूसरे के घर आने-जाने का सिलसिला शुरू हो गया। मौका देखकर उस व्यक्ति ने एक दिन न्यायाधीश महोदय से एक केस के बारे में सहानुभूति का रुख अपनाने का अनुरोध किया। न्यायाधीश महोदय ने देखा कि केस तो निहायत खराब है । अपने इस नए बने मित्र को मदद देने की उनकी इच्छा तो हुई, पर उनके न्यायपरायण मन ने ऐसा नहीं होने दिया और फैसला उस व्यक्ति के विरुद्ध हुआ। तब से उस व्यक्ति का आना- जाना और मेलजोल ही बंद हो गया। यदि न्यायाधीश महोदय इच्छाशक्ति संपन्न ना होते, तो परिग्रह उन्हें ले डूबता।                                                इस घटना से एक और संकेत मिलता है कि जो लोग किसी को  स्वार्थवश भेज देते रहते हैं, उनका स्वार्थ यदि ना सधा, तो उनका भेंट देने का क्रम बंद हो जाता है। परिग्रह में स्वार्थ का यह तत्व अनिवार्य रूप से मिला रहता है। इसीलिए नैतिक जीवन बिताने हेतु अपरिग्रह पर इतना जोर दिया जाता है।'परिग्रह' का एक और अर्थ हिंदी में रूढ़ हो गया है - वह है 'आवश्यकता से अधिक का संचय।' यह खुला रहस्य है कि जब भी हम आवश्यकता से अधिक कुछ संचय करते हैं, तो दूसरे के हक को मारकर ही ऐसा करते हैं। 'आवश्यकता की परिभाषा' अलग अलग व्यक्ति के संदर्भ में अलग अलग हो सकती है, पर जो भी अपनी आवश्यकता से अधिक का संचय करेगा, वह दूसरे का अधिकार छीन कर ही वैसा करेगा। इस दृष्टि से भी परिग्रह नैतिक मूल्यों का विरोधी है। वह समाज के संतुलन को बिगाड़ देता है । जनता की गरीबी के मूल में, देश के शेष लोगों का परिग्रह ही है। अपरिग्रह का गुण ऐसी दूषित मनोवृति के लिए अंकुश का काम करता है और सामाजिक स्वस्थता के लिए उचित वातावरण का निर्माण करता है।