आत्मोन्नति के सोपान-11   

 स्वाध्याय  

(स्वामी आत्मानंद जी की रेडियो वार्ता)                                  

 मनुष्य अपने जीवन में कई प्रकार की आदतें डाल लिया करता है. तन और मन को प्रिय लगने वाली आदतें तो बहुत जल्दी लग जाती हैं. पर विवेक को रुचने वाली आदतों का निर्माण प्रयत्न पूर्वक करना पड़ता है . जल को नीचे बहने में किसी प्रकार का श्रम नहीं होता, बल्कि ढाल में उसकी गति अपने आप तेज हो जाती है . पर उसे यदि कोई ऊपर ले जाना चाहे, तो श्रम करना पड़ता है, पम्प लगाना पड़ता है . उसी प्रकार जो बातें मन को निम्नगामी ही बनाती हैं, उनकी आदत अपने आप लग जाती है. पर  जिससे मन और ऊर्ध्वगामी बनता है, उनकी आदत प्रयत्न पूर्वक लगानी पड़ती है . ऐसी ही आदतों में से एक है 'स्वाध्याय' यानी अध्ययन का अभ्यास .               कई लोगों को हल्की - फुल्की कहानियां और उपन्यास पढ़ने का शौक होता है.पर इसे अध्ययन नहीं कहा जाएगा . अध्ययन वह है, जिससे हम कुछ सीखने की कोशिश करते हैं. स्वाध्याय हममें ज्ञान पैदा करता है. ज्ञान उसे कहते हैं, जो उचित और अनुचित का भेद बताता है. वह सिखाता है इससे व्यक्ति का कल्याण होता है.और किससे अकल्याण. अध्ययन मनुष्य को बुराइयों से बचाता है. कहा जा सकता है कि इतिहास में ऐसे भी महान पुरुष को गए हैं, जो लिखना पढ़ना नहीं जानते थे, अतः जिनके लिए अध्ययन स्वाध्याय संभव नहीं था. पर यह तर्क अध्ययन की उपयोगिता को दबा नहीं सकता. बिना पढ़े भी मनुष्य महान हो सकता है. पर यह अपवाद है, सामान्य नियम नहीं . और हम तो सामान्य स्तर पर सर्व सामान्य लोगों के लिए यह चर्चा कर रहे हैं. अध्ययन वह  खराद है, जिसके द्वारा आत्म संस्कार साधित होता है . स्वामी विवेकानंद के संबंध में कहा  जाता है कि वे इतने विद्या व्यसनी थे, इतने अध्ययन- प्रेमी थे, कि मोटा से मोटा ग्रंथ अल्प समय में पढ़ लेते थे. वे पृष्ट की पहली और अंतिम पंक्तियों को पढ़कर पूरे पृष्ट का कथ्य समझ लेते थे.  उनकी यह प्रतिभा अध्ययन का ही फल थी.  फिर कहा जाता है कि उन्होंने ऐसी दो बातें कही थी, जिन्हें भविष्यवाणी का दर्जा दिया जा सकता है. विश्व प्रसिद्ध होने के पूर्व अमेरिका के अनिस्काम नामक गांव की घटना है, जहां उन्होंने एक तो यह कहा था की जब अंग्रेज भारत छोड़कर चले जाएंगे, तब की चीनीयों द्वारा भारत पर आक्रमण का डर बना रहेगा और दूसरा यह कि आगामी दिनों में एक ऐसी महान हलचल जो विश्व में नए युग का प्रारंभ करेगी या तो रूस से शुरू होगी या चीन से . यह बात उन्होंने जुलाई 1893 में कही थी. तब श्रोताओं में से किसी को इस पर विश्वास नहीं हुआ. जब एक ने पूछा- क्या आप भविष्य दृष्टा हैं? तो स्वामी जी ने कहा था "मैं भविष्य दृष्टा नहीं इतिहास दृष्टा हूं ". स्वामी विवेकानंद यह जो अपने को इतिहास दृष्टा कहते हैं तो उनको यह दृष्टि इतिहास के अध्ययन से मिली थी. अध्ययन का, स्वाध्याय का ऐसा चमत्कार होता है. यह तो स्वाध्याय के बड़े लाभ हुए . पर सामान्य जनों के लिए बहुत से छोटे-छोटे लाभ भी हैं. इसके द्वारा हम घर बैठे दुनिया के धुरंधर विद्वानों के विचारों का लाभ ले सकते हैं तथा विश्व के प्राचीनतम मनीषियों के साथ सत्संग कर सकते हैं. ग्रंथ के अनुशलन से देश और काल की दूरियां खत्म हो जाती है. यदि हम बीमार हो, तो समय अच्छे ढंग से कट जाता है. अवकाश प्राप्त व्यक्ति को मानो समय काटता है. वह बिताए नहीं बीतता और उसे अपना जीवन एक फिजूल बोध मालूम पड़ता है. पर यदि वह स्वाध्याय की आदत डाल ले , तो उसकी ऊपर बताई समस्याएं अपने आप मिट जाती हैं और उसे अपने जीवन की सार्थकता मालूम होती है . उसे फिर साथियों का अभाव नहीं अभाव नहीं खलता . स्वाध्याय हमें मनोबल प्रदान करता है और हमें अध्यवसाय के प्रति प्रेम भरता है. हतोत्साहित व्यक्ति के लिए भी स्वाध्याय रामबाण दवा है . उसे कोई ऐसा सूत्र मिल जाता है, जिससे  उसमें उत्साह की नयी किरण पैदा होती है और परिस्थितियों से मुठभेड़ लेने के लिए वह उद्यत हो जाता है . अतएव जीवन में यदि हमें कोई चस्का लगाना ही है, तो हम अध्ययन स्वाध्याय का चस्का लगावें.