समय की पाबन्दी
(स्वामी आत्मानंद जी की रेडियो वार्ता)।
मेरे एक मित्र हैं । समय के बड़े पाबन्द है । आज एक सफल उद्योगपति हैं । शिक्षक थे। वे अपनी सफलता का श्रेय समय की पाबन्दी को देते हैं । एक बार उन्होंने किसी उच्च अधिकारी से मिलने का समय लिया था। जिस समय उन्हें मिलने जाना था, उस समय घनघोर वर्षा हो रही थी। स्वाभाविक ही किसी का भी मन कहता कि बाद में मिल लेंगे, अभी ही मिलना इतना जरूरी नहीं है। उन्होंने मन को कोई बहानेबाजी नहीं करने दी और उस भयंकर वर्षा में भीगते हुए वे समय पर ही मिलने के लिए पहुंच गए। अधिकारी को बड़ा ही आश्चर्य हुआ, पर साथ ही उन्हें प्रसन्नता भी हुई कि कम से कम एक व्यक्ति तो उन्होंने देखा, जो समय का इतना पाबंद था । बस उन्होंने मेरे मित्र का काम तुरंत कर दिया और तब से वे एक-एक करके सफलता के सोपानों पर चढ़ते गए । समय की पाबंदी जीवन के सभी क्षेत्रों में काम की है। यदि हम समय पर उठने, सोने, खाने - पीने और अपने काम-काज की आदत डालें, तो हम महानता प्राप्त करने की ओर एक सार्थक कदम उठा सकते हैं। इसके द्वारा अल्प समय में कार्य करने की क्षमता पैदा होती है। संसार में जिन व्यक्तियों ने महानता अर्जित की है, उनमें से अधिकांश का जीवन समय की पाबंदी की एक सुंदर गाथा रहा है। महात्मा गांधी इसके ज्वलन्त उदाहरण रहे हैं। उनकी समय की पाबंदी के बहुत से किस्से हैं, जो यही दर्शाते हैं कि उन्होंने अपने जीवन की क्रियाओं को किस प्रकार समय के द्वारा नियंत्रित कर लिया था। प्रत्येक व्यक्ति बड़ा तो बनना चाहता है, पर उसके लिए वह किसी प्रकार की साधना नहीं करना चाहता। छल, बल या धन के जोर पर किसी को बड़प्पन नहीं मिला करता । जो मिला-सा दिखाई देता है, वह बालू की नींव पर बने मकान के समान तनिक से आघात से ढह जाता है। सच्चा बड़प्पन बाधाओं में तप कर और निखरता है। ऐसा बड़प्पन प्राप्त करने का प्रथम सोपान है- समय की उपासना । समय की उपासना हमारे आलस्य और जड़ता को दूर करती है। तमोगुण के आधिक्य को काटती है और बुद्धि को तेज बनाती है। बहुधा देखा जाता है कि यदि समय पर काम ना हो, तो काम टल जाता है और हम दीर्घ-सूत्रता के शिकार हो जाते हैं। कहा जाता है कि विश्व विजेता नेपोलियन एक मिनट के विलंब से पहुंचने के ही कारण वाटरलू के संग्राम में पराजित हो गया|जो समय की कीमत नहीं समझता, वह वास्तव में मानव - जीवन का सही मूल्यांकन नहीं कर पाता । ऐसे व्यक्ति के लिए जीवन में कोई उद्देश्य या लक्ष्य नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें तो वह पशुओं से किसी भी प्रकार उच्चतर जीवन नहीं बताता । पशु, काल की गणना नहीं करता और इसीलिए उसमें काल का आयाम नहीं होता। पर मनुष्य काल की गणना करता है। काल की पकड़ का पहला कदम है समय की पाबंदी।धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में भी समय की पाबंदी अनिवार्य बताई गई है। यदि मैं साधना के क्षेत्र में पदार्पण करने का इच्छुक हूं, तो निश्चित समय पर प्रतिदिन की साधना शीघ्र फलवती होती है। कुछ पूछते हैं कि समय की निश्चितता पर इतना जोर क्यों? इसका उत्तर यह है कि कोई काम रोज एक निश्चित समय पर किया जाय, तो ठीक उस समय हमारा मन उस कार्य की ओर अपने आप उन्मुख होने लगेगा। उदाहरणार्थ, यदि मुझे चार बजे अपराह्न में चाय पीने की आदत है, तो चार बजते ही मेरे मन में चाय की इच्छा जागृत हो जाएगी। यही तर्क निश्चित समय में साधना करने या अन्य कोई काम करने पर भी लागू होता है । उससे हमारा मन अधिक एकाग्र हो जाता है और उसकी छिपी हुई क्षमता अधिकाधिक प्रकट होती है |समय की पाबंदी वस्तुत मन के केंद्रीकरण का अभ्यास है। मन में असीम सम्भावनाएं निहित है । इन सम्भावनाओं को प्रकट करने का साधन मन का केन्द्रीकरण ही है। समय की पाबन्दी का अभ्यास पहले - पहल कष्टप्रद मालूम होता है, पर धैर्य पूर्वक यदि उसे कोई साध लेता है, तो उसके लिए विश्व अपना खजाना खोल देता है।