स्वच्छता।
(स्वामी आत्मानंद जी की रेडियो वार्ता)।
स्वच्छता को भी देशों में सर्वोपरि महत्व दिया गया है। अंग्रेजी में तो एक कहावत ही है -"Cleanliness is next to godliness"- अर्थात् ईश्वर के बाद यदि किसी की महत्ता है, तो वह है स्वच्छता की । यह उचित ही है, क्योंकि ईश्वर समस्त शुभ का प्रतीक है और जहां भी शुभत्व है, वहां हमें पवित्र्य का बोध होता है । पवित्र्य और शुभत्व दोनों साथ साथ चलते हैं। एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। और पवित्र्य, फिर स्वच्छता का ही तो दूसरा नाम है। सर्वप्रथम है शारीरिक स्वच्छता । हम शरीर को जल के द्वारा स्वच्छ करते हैं। हमारे वस्त्र भी साफ-सुथरे होने चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि वह धोबी के यहां से ही धुल कर आयें और इस्तरी किए हुए हों। तात्पर्य केवल इतना है कि वे मैले न हों। उसके बाद है मन की पवित्रता। मन को बुरे विचारों से बचाने का तरीका है- उसे व्यस्त रखना और अवकाश के समय उसे स्वस्थ मनोरंजन में लगाना। मन खाली रहने पर बहुत उछल - कूद करता है और कई प्रकार के अवांछनीय विचारों को पोस लेता है। फिर, वाणी पर भी नियंत्रण बहुत आवश्यक है। जो वचन पूर्ण पवित्र ना हों, उनसे हमें बचना चाहिए । हमें इस प्रकार से बर्ताव करना चाहिए, और जिससे दूसरे लोग हमारे सामने कोई अशुभ चर्चा करने का साहस न कर सकें। हमें सदैव यही प्रयत्न करना चाहिए कि शुभ विचारों का एक अन्तर्प्रवाह हमारे भीतर बहता रहे । वह बुरे विचारों से हमारी रक्षा करेगा और हमारे चारों ओर पवित्रता तथा नैतिकता का वातावरण बनाएगा । पर हम यह ध्यान रखें कि ऐसा कहना तो सरल है, पर करना नहीं। जब हम शुभ विचार मन में उठाने की कोशिश करते हैं, तो सामान्यतः सफल नहीं होते। मन की पवित्रता के लिए हमें कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना होगा। पहली तो यह कि हम सोने के पहले ऐसा साहित्य न पढ़ें, जो हमारी उत्तेजना को बढ़ावे और हमारी निम्न मनोवृत्तियों को जगावे । कारण यह कि हमारे सो जाने के बाद भी वह उत्तेजना हमारे अवचेतन मन को प्रभावित करती रहती है। इसका परिणाम बहुत बुरा होता है ।चाहिए तो यह कि हम उस समय अपने मन को किसी पवित्र विचार या ध्वनि में लगाएं। ज्यों-ज्यों हम निद्रा की गोद में उतरते जाएं, त्यों-त्यों उस पवित्र विचार या ध्वनि का शांतिपूर्ण और गहरा चिंतन करें। अपने अवचेतन मन के उपादानों को बदलने का यह सबसे प्रभावी साधन है। वास्तविक शुचिता, अवचेतन मन को बदलने से आती है । हम जागृत अवस्था में बल पूर्वक अपने चेतन मन को अपवित्र बातों की ओर जाने से एक बार रोक भी सकते हैं। पर यदि हमारा अवचेतन मन शुद्ध नहीं हुआ, तो स्वप्न में हम उन बातों का अनुभव करते हैं, जिनकी ओर जाने से हमने चेतन मन को बलपूर्वक रोक दिया था। अतः मन की स्वच्छता का मापदंड स्वप्न है । यदि सपने में भी हमारा मन अपवित्र बातों की ओर ना जाता हो, तो समझ लेना चाहिए कि हमने मानसिकता स्वच्छता हासिल कर ली। इस अवस्था की उपलब्धि के लिए दूसरी बात यह है कि हमें अच्छी आदतें डालनी चाहिए और उन्हें पुष्ट करना चाहिए । यह प्रक्रिया हमारे मन को शक्ति प्रदान करेगी। वास्तव में मन की दुर्बलता का कारण उसकी अस्वच्छता होती है। स्वच्छ मन शक्ति का भंडार होता है । निर्मल हुआ मन निडरता पूर्वक सत्य का सामना करता है। और मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा सत्य है इतना है। अतः निर्मल मन, मृत्यु-भय को जीत लेता है । वह हमें सिखाता है कि 'अरथी' उतनी ही सत्य है, जितना की 'पालना'। 'श्मशान' उतना ही सत्य है, जितना कि 'सौरी'। फिर एक से हम क्यों भागें और दूसरे से उत्फुल्ल क्यों हों? ना तो हम जीवन से चिपकें और मृत्यु से भागें। जो व्यक्ति इस प्रकार तन, मन और वचन से स्वच्छ हो जाता है; वह ईश्वर के निकट पहुंच जाता है । वह मानवता के लिए वरदान स्वरुप बन जाता है।