अनुशासन
(स्वामी आत्मानंद जी की रेडियो वार्ता)
मेरे एक मित्र हैं। उन्हें पेड़-पौधों से बड़ा प्यार है। बड़ा जतन करते हैं। ऐसी देखभाल करते हैं, मानो वे उनके बच्चे हैं। उन्होंने अशोक का एक पौधा लगाया। पौधा बढ़ने लगा। जो डाली, उन्हें अनावश्यक प्रतीत होती, उसे वे काट देते। यदि तना उन्हें झुकता नजर आता, तो वे खपच्ची बांधकर सीधा कर देते। ऊपर की शाखा -प्रशाखा को छांट कर गोल आकार कर दिया करते। कुछ वर्ष बाद पौधा बढ़कर एक परिपक्व वृक्ष बन गया। कितना सुंदर- कितना मोहक। देखो, तो आंखें वहीं गढ़ जाती। मैंने भी देखादेखी अशोक का एक वृक्ष रोप दिया। वह बढ़ने लगा और कुछ वर्ष बाद वह भी एक बड़ा पेड़ बन गया। पर उसमें मित्र के पेड़ सी; न तो सुंदरता थी, ना मोहकता। कारण का चिंतन करने पर मित्र ने बताया कि तुम्हारे पेड़ का विकास बेतरतीब था। अनुशासन नहीं था। मित्र ने मुझसे पूछा - "क्या तुम उचित समय पर अनावश्यक डालियों को काटते थे?" "तने को झुकने से बचाने के लिए खपच्ची लगाते थे?" मेरा उत्तर नहीं में था। मतलब यह कि पेड़ का विकास भी यदि हमें मनोवांछित रूप से साधित करना है, तो उसे अनुशासन में रखना होगा।मेरी आंखें खुल गयीं। देश बौना हो गया है। देश के अंग- प्रत्यंग बेतरतीब बढ़ें हैं। कारण समझ में आ गया। देश को आजादी के इन 35 वर्षों में अनुशासन की प्रक्रिया में नहीं बांधा गया। सुंदर-सुंदर पौधों को सही दिशा नहीं दी गई। इसलिए वे बेतरतीब बढ़कर देश की खुशहाली के साधक होने के बदले, बाधक बन गए। हमने आजादी के पहले का वह पाठ भुला दिया कि जब एक सामान्य पौधे को इच्छा अनुकूल रूप देने के लिए इतनी साधना की आवश्यकता होती है, तब मानव रूपी पौधे को उचित आकार देने के लिए कितनी तपस्या ना लगती होगी। और उसका फल प्रत्यक्ष है। हम बड़ी उपलब्धि चाहते हैं, पर अनुशासन में हमें पसंद नहीं। तो यह उपलब्धि कैसे हासिल हो सकती है? मैं पंडित रविशंकर के सितार वादन की प्रशंसा कर सकता हूं, पर तब मैं यह भूल जाता हूं कि कि इस योग्यता को प्राप्त करने के लिए रविशंकर को अनुशासन की कैसी कड़ी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा होगा। मेरे एक वेद पाठी मित्र हैं।आज एक पाठ में उनका नाम देश भर में फैला है। उन्हें बचपन में वेद पाठ करते हुए देखता था। पिता छड़ी लेकर पुत्र को वेद पाठ सिखा रहे हैं। आरोह और अवरोह में किसी शब्द में पुत्र ने भूल की, तो तड़ से बेंत की मार उन्हें सहनी पड़ती थी। उस समय तो लगता था कि यह कठोरता है। पर आज उसी कठोरता का कितना मीठा फल उन्हें मिला है। तब पिता के प्रति उनका आक्रोश था। आज उन्हीं पिता के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए थकते नहीं। यह अनुशासन प्रारंभ में कठोर तो लगता है, पर उसका फल महान बनाने वाला होता है। अनुशासन वह खराद है, जो हीरे का मल दूर कर उसे चमका देता है। हम चमकना तो चाहते हैं, पर खराद की प्रक्रिया से गुजरना हमें पसंद नहीं। हम सब कुछ आसानी से शॉर्ट कट के द्वारा प्राप्त करना चाहते हैं। हम इसे बुद्धिमानी समझते हैं। पर है यह हमारी नादानी। और हमारी यह नादानी देश को किस प्रकार तबाह कर रही है, यह दृश्य तो आंखों के सामने ही है। स्वामी विवेकानंद ने आज से नब्बे वर्ष पहले कहा था- "चालाकी से कोई बड़ा काम नहीं हो सकता।" उनका यह कथन आज के संदर्भ में कितना सत्य है। हम चालाकी को ही बड़ा होने का रसायन समझ बैठे हैं। और विडंबना यह है कि हम तो अनुशासित नहीं रहना चाहते, पर दूसरों से अपेक्षा करते हैं कि वे अनुशासन में रहें। क्या यह कभी संभव है? अनुशासन प्रारंभ में बलपूर्वक ही करना पड़ता है, बाद में वह सहज हो जाता है। भय का अनुशासन अस्थाई होता है । वह भय के दूर होते ही नष्ट हो जाता है। इसका अनुभव हमने आपातकाल में किया है। टिकाऊ अनुशासन वह है जो भीतर से आता है उसमें समाज बोध जुड़ा रहता है । निपट स्वार्थी व्यक्ति अनुशासन का बंधन स्वीकार नहीं करता। हमें सामाजिक चेतना का पाठ नहीं पढ़ाया गया है। हमारा धर्म भी प्रचलित तौर पर स्वार्थ का ही पाठ पढ़ाता है -अपने पुण्य और अपने मोक्ष की बात पर जोर देता है । जब तक यह दृष्टिकोण ना बदला गया और सामाजिक चेतना को सर्वोपरि स्थान न दिया गया, तब तक अनुशासन हमारे लिए अरण्य रुदन ही सिद्ध होगा। और हम एक राष्ट्र के रूप में बौने ही रहेंगे।